भारत को अमेरिका से मिला नाटो देशों के समान दर्जा, रक्षा संबंधों में फायदा होगा

वॉशिंगटन. अमेरिकी संसद ने मंगलवार को एक प्रस्ताव पास किया। इसके मुताबिक भारत को भी नाटो देशों जैसा दर्जा मिलेगा। इससे दोनों देशों के बीच रक्षा संबंधों को और बढ़ावा मिलेगा। अब तक साउथ कोरिया, ऑस्ट्रेलिया और जापान को यह दर्जा प्राप्त था।

भारत-अमेरिका हिंदा महासागर में रक्षा सहयोग बढ़ाएंगे

  1. पिछले सप्ताह अमेरिकी संसद के द्वारा नेशनल डिफेंस ऑथराइजेशन एक्ट (एनडीएए) वित्तीय वर्ष 2020 पास किया गया। इसके अंतर्गत भारत-अमेरिका हिंद महासागर में रक्षा सहयोग बढ़ाएंगे। इसके अंतर्गत समुद्री सुरक्षा, समुद्री डकैती, आतंकवाद का मुकाबला, मानवीय सहयोग जैसी चीजें आएंगी।
  2. 2016 में अमेरिका ने भारत को रक्षा मामलों में बड़ा साझेदार माना। इस दर्जे के बाद भारत अमेरिका से और भी ज्यादा एडवांस तकनीक से लैस हथियार खरीद सकेगा।
  3. जुलाई 2018 में डोनाल्ड ट्रम्प प्रशासन ने भारत को स्ट्रेटेजिक ट्रेड ऑथराइजेशन देश का दर्जा दिया था। साउथ एशियाई देशों में भारत एकमात्र देश जिसके पास यह दर्जा है। इस कदम से उच्च तकनीक वाले उत्पादों के आयात में आसानी आ पाएगी।
  4. हिंदू अमेरिकी फाउंडेशन ने विधेयक पारित होने के बाद इसके लिए किए गए प्रयासों को लेकर संसद की प्रशंसा की। हिंदू अमेरिकी फाउंडेशन के एमडी समीर कालरा ने कहा- भारत को गैर-नाटो देश के दर्जे से ऊपर लाना महत्वपूर्ण है। यह भारत और अमेरिका के बीच अभूतपूर्व संबंधों की शुरुआत है।
  • रक्षा संबंधों के मामले में अमेरिका भारत के साथ नाटो के अपने सहयोगी देशों, इजरायल और साउथ कोरिया की तर्ज पर ही डील करेगा
  • वित्त वर्ष 2020 के लिए नैशनल डिफेंस ऑथराइजेशन ऐक्ट को अमेरिकी सेनेट ने पिछले सप्ताह मंजूरी दी थी
  • हिंदू अमेरिकी फाउंडेश के एमडी समीर कालरा ने कहा, ‘भारत को गैर-नाटो देश के दर्जे से ऊपर लाना बेहद महत्वपूर्ण है

अमेरिकी संसद ने भारत को नाटो देशों के समान दर्जा देने वाले प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है। अब रक्षा संबंधों के मामले में अमेरिका भारत के साथ नाटो के अपने सहयोगी देशों, इजरायल और साउथ कोरिया की तर्ज पर ही डील करेगा। वित्त वर्ष 2020 के लिए नैशनल डिफेंस ऑथराइजेशन ऐक्ट को अमेरिकी सेनेट ने पिछले सप्ताह मंजूरी दी थी। अब इस विधेयक में संशोधन के प्रस्ताव को भी मंजूरी मिल गई है। सेनेटर जॉन कॉर्निन और मार्क वॉर्नर की ओर से पेश किए गए विधेयक में कहा गया था कि हिंद महासागर में भारत के साथ मानवीय सहयोग, आतंक के खिलाफ संघर्ष, काउंटर-पाइरेसी और मैरीटाइम सिक्यॉरिटी पर काम करने की जरूरत है।

विधेयक पारित होने के बाद हिंदू अमेरिकी फाउंडेशन ने सेनेटर कॉर्निन और वॉर्नर का अभिनंदन किया। हिंदू अमेरिकी फाउंडेश के एमडी समीर कालरा ने कहा, ‘भारत को गैर-नाटो देश के दर्जे से ऊपर लाना बेहद महत्वपूर्ण है। यह भारत और अमेरिका के बीच अभूतपूर्व संबंधों की शुरुआत है।’ हिंदू अमेरिका फाउंडेशन की ओर से आयोजित एक कार्यक्रम में शेरमैन ने कहा कि यह बेहद महत्वपूर्ण है कि हमने अमेरिका और भारत के बीच के संबंधों के महत्व को समझा है।

अमेरिका ने भारत को 2016 में बड़ा रक्षा साझीदार माना था। इस दर्जे का अर्थ है कि भारत उससे अधिक अडवांस और महत्वपूर्ण तकनीक वाले हथियारों की खरीद कर सकता है। अमेरिका के करीबी देशों की तरह ही भारत उससे हथियारों और तकनीक की खरीद कर सकता है।

भारत को नाटो सहयोगियों जैसा दर्जा देने वाले प्रस्ताव से जुड़ा विधेयक सोमवार को अमेरिकी सीनेट में पारित हो गया. पीटीआई के मुताबिक इस प्रस्ताव को सीनेटर मार्क वार्नर और सीनेटर जॉन कॉर्निन ने सदन में पेश किया था. इसमें हिंद महासागर में भारत के साथ मानवीय सहयोग, आतंक के खिलाफ लड़ाई और समुद्री सुरक्षा जैसे मुद्दों पर मिलकर काम करने की जरूरत बताई गई है.

अमेरिकी मीडिया के मुताबिक अब ये विधेयक वहां के निचले सदन यानी हाउस ऑफ रेप्रेजेंटेटिव में जाएगा. यहां से पास होने के बाद ये कानून का रूप ले लेगा. इससे अमेरिका और भारत के बीच रक्षा सहयोग को एक नए स्तर पर ले जाने में मदद मिलेगी. भारत को अमेरिका की चुनिंदा अत्याधुनिक रक्षा तकनीकें भी मिल सकेंगी. इससे पहले अमेरिका, इजरायल और दक्षिण कोरिया को नाटो देशों जैसा दर्जा दे चुका है.

सोमवार को इस विधेयक के पारित होने के बाद हिंदू अमेरिकी फाउंडेशन ने सीनेटर कॉर्निन और वॉर्नर का अभिनंदन किया. हिंदू अमेरिकी फाउंडेश के एमडी समीर कालरा ने कहा, ‘भारत को गैर-नाटो देश के दर्जे से ऊपर लाना बेहद महत्वपूर्ण है. यह भारत और अमेरिका के बीच अभूतपूर्व संबंधों की शुरुआत है.’

अमेरिकी सीनेट ने भारत को नाटो सहयोगियों जैसा दर्जा देने के लिए एक विधेयक को पारित किया है। यह विधेयक भारत को अमेरिका के नाटो सहयोगियों के बराबर का दर्जा प्रदान करता है। इससे पहले अमेरिका इजरायल और दक्षिण कोरिया को यह दर्जा दे चुका है।

वित्तीय वर्ष 2020 के लिए राष्ट्रीय रक्षा प्राधिकरण अधिनियम (NDAA) के संसोधन को अमेरिकी सीनेट ने पारित किया। इससे भारत को अमेरिका के साथ रक्षा सहयोग बढ़ाने में सहायता मिलेगी। इस विधेयक के पारित होने से अमेरिका अब अपनी सभी जटिल रक्षा तकनीकी भारत को दे सकता है।

इस विधेयक में संशोधन प्रस्ताल को सीनेटर मार्क वार्नर और सीनेटर जॉन कॉर्निन ने पेश किया। इस संशोधन से हिंद महासागर में भारत अमेरिका के बीच मानवीय सहायता, आतंकवाद विरोधी अभियान, समुद्री डकैतों के खिलाफ अभियान और समुद्री सुरक्षा जैसे क्षेत्रों रक्षा सहयोग के क्षेत्रों में सहयोग बढ़ेगा।

इस विधेयक को अमेरिकी कांग्रेस के दोनों सदनों- प्रतिनिधि सभा और सीनेट में पास होने के बाद कानून में बदला जाएगा। आशा जताई जा रही है कि 29 जुलाई से शुरू होने वाले एक महीने के अवकाश से पहले ही इस विधेयक को प्रतिनिधि सभा में पास करने के लिए पेश किया जाएगा।

क्या है नाटो

उत्तर अटलांटिक संधि संगठन (नाटो) विभिन्न देशों का रक्षा सहयोग संगठन है। इसकी स्थापना 4 अप्रैल 1949 को हुई थी जिसका मुख्यालय बेल्जियम की राजधानी ब्रसेल्स में है। आरम्भ में नाटो के सदस्य देशों की संख्या 12 थी जो अब बढ़कर 29 हो चुकी है। नाटो का सबसे नया सदस्य देश मोंटेनिग्रो है, यह 5 जून, 2017 को नाटो का सदस्य बना था। नाटो के सभी सदस्यों की संयुक्त सैन्य खर्च दुनिया के कुल रक्षा खर्च का 70 फीसदी से अधिक है।

क्यों हुई थी स्थापना

द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद तत्कालीन सोवियत संघ ने पूर्वी यूरोप से अपनी सेनाएं हटाने से इंकार कर दिया और अंतरराष्ट्रीय संधियों का उल्लंघन कर 1948 में बर्लिन की नाकेबंदी कर दी। इसलिए अमेरिका ने एक ऐसा संगठन बनाने की कोशिश की जो उस समय के शक्तिशाली सोवियत संघ के अतिक्रमण से रक्षा कर सके।

सदस्य देश

संयुक्त राज्य अमेरिका, यूनाइटेड किंगडम, फ्रांस, कनाडा, इटली, नीदरलैंड, आइसलैण्ड, बेल्जियम, लक्जमर्ग, नार्वे, पुर्तगाल, डेनमार्क, अल्बानिया, बुल्गारिया, क्रोएशिया, चेक रिपब्लिक, इस्तोनिया, जर्मनी, ग्रीस, लातविया, लिथुआनिया, लक्जमबर्ग, मोंटेनिग्रो, पोलैंड, स्लोवाकिया, स्लोवेनिया, स्पेन, तुर्की, रोमानिया

अमेरिकी सीनेट ने रक्षा सहयोग को बढ़ावा देने के लिए एक कानून पारित किया है, जिससे भारत का दर्जा अमेरिका के नाटो सहयोगियों और इजराइल एवं दक्षिण कोरिया जैसे देशों के समान हो जाएगा। वित्त वर्ष 2020 के लिए पिछले सप्ताह पारित राष्ट्रीय रक्षा प्राधिकरण अधिनियम (एनडीएए) में इस तरह का प्रस्ताव निहित था।

सीनेट इंडिया कॉकस के सह अध्यक्ष सांसद मार्क वार्नर के समर्थन से सीनेट इंडिया कॉकस के सह अध्यक्ष सांसद जॉन कॉर्निन द्वारा पेश किए गए संशोधन में मानवीय मदद, आतंकवाद, जल-दस्युओं से निपटने और समुद्री सुरक्षा के क्षेत्र में हिंद महासागर में भारत-अमेरिका रक्षा सहयोग को बढ़ावा देने जैसे मुद्दों को शामिल किया गया है।

पिछले सप्ताह हाउस इंडिया कॉकस के सह अध्यक्ष ब्रैड शर्मन ने कांग्रेस सांसद जोए विलसन, अमी बेरा, टेड योहो, जॉर्ज होल्डिंग, एड केस और राजा कृष्णमूर्ति के साथ ऐसा ही कानूनी प्रस्ताव ‘हाउस एफवाई 2020 एनडीएए’ पेश किया था, जिससे भारत-अमेरिका संबंधों को और बढ़ावा मिलेगा।

अमेरिकी कांग्रेस के दोनों सदनों (प्रतिनिधि सभा एवं सीनेट) द्वारा पारित किए जाने के बाद यह विधेयक हस्ताक्षर के बाद कानून बन जाएगा। सदन द्वारा एनडीएए के इस संस्करण को जुलाई में किसी समय पेश करने की संभावना है क्योंकि अगस्त में एक महीने के अवकाश के लिए 29 जुलाई को सदन स्थगित कर दिया जाएगा। भारत-अमेरिका सामरिक भागीदारी को बढ़ावा देने के लिए हिंदू अमेरिकन फाउंडेशन ने एक बयान में सीनेटर कॉर्निन और वार्नर की प्रशंसा की है।

भारत को भी नाटो देशों की तरह मिलेगा तकनीक का फायदा
वर्तमान में भारत, अमेरिका का गैर नाटो सहयोगी है। यह दर्जा मिलने के बाद जापान और आस्ट्रेलिया जैसे अन्य नाटो सहयोगियों की तरह भारत को भी शीर्ष रंग टेक्नोलाजी तक पहुंच मिल जाएगा। लेकिन भारत पहले से ही अमेरिका का बड़ा रक्षा साझीदार है और उसे अत्याधुनिक तकनीक तक पहुंच हासिल है।

इससे कोई बड़ा अंतर नहीं आएगा, लेकिन सीनेट एक शक्तिशाली निकाय है इसलिए भारत-अमेरिका साझीदारी के पक्ष में विश्वास मत एक महत्वपूर्ण कदम है। पूर्व विदेश सचिव ललित मानसिंह ने कहा कि इस कदम का स्वागत किया जाना चाहिए।

ओसाका में आयोजित जी-20 की बैठक में प्रधानमंत्री मोदी ने एक बार फिर अपनी अंतरराष्ट्रीय छवि को निखारने का काम किया। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से विभिन्न मसलों पर वार्ता के दौरान भारतीय प्रधानमंत्री जिस तरह सहज दिखाई दिए उससे यही स्पष्ट हुआ कि वह अमेरिकी राष्ट्रपति को यह समझाने में सफल रहे कि भारत अप

मोदी-ट्रंप वार्ता
यह तो तय था कि दोनों नेताओं के बीच व्यापार, ईरान, रक्षा समेत विभिन्न मसलों पर चर्चा होगी, क्योंकि जापान रवाना होने के पहले ही ट्रंप यह कह चुके थे कि उन्हें अमेरिकी उत्पादों पर आयात शुल्क बढ़ाने का भारत का फैसला मंजूर नहीं, लेकिन ओसाका में उन्होंने जिस तरह भारत से संबंध मजबूत करने पर बल दिया और भारत से निकटता का हवाला देते हुए पीएम मोदी को अपना दोस्त बताया उससे यही लगता है कि उन्हें यह आभास हुआ कि मोदी के नेतृत्व वाले भारत को दबाया नहीं जा सकता।

भारत-अमेरिका के बीच सहमति
भारत-अमेरिका के रिश्ते सही दिशा में बढ़ रहे हैैं, इसका संकेत दोनों नेताओं के बीच बनी इस सहमति से मिला कि व्यापार संबंधी मामलों को सुलझाने के लिए दोनों देशों के वाणिज्य मंत्रियों के बीच जल्द ही बैठक होगी। उल्लेखनीय है कि दोनों नेताओं की वार्ता में रूसी मिसाइल सिस्टम एस-400 पर कोई चर्चा नहीं हुई। अमेरिका इस सौदे पर आपत्ति जता जा चुका है। ट्रंप प्रशासन चीनी कंपनी हुआवे के प्रति भी भारत को आगाह करते हुए यह चाह रहा है कि वह भी इस कंपनी के खिलाफ अमेरिका जैसा रुख क्यों नहीं अपना रहा है?

अमेरिका-ईरान में तनातनी के बीच जी-20 बैठक

जी-20 की बैठक ऐसे समय में हुई जब अमेरिका और ईरान के बीच तनातनी बढ़ने के कारण विश्व आशंकित है। ट्रंप अमेरिका फर्स्ट की नीति पर न केवल जोर दे रहे हैैं, बल्कि उसे बढ़ावा देते हुए वह विभिन्न देशों से टकराव भी मोल ले रहे हैैं। व्यापार, पश्चिम एशिया के हालात से लेकर पर्यावरण जैसे मसलों पर उनका कठोर रवैया यही बताता है कि वह अमेरिकी हितों के आगे और किसी की परवाह नहीं कर रहे हैैं। ऐसा करते हुए वह कूटनीतिक तौर-तरीकों को भी दरकिनार करने में संकोच नहीं करते। जब वह ऐसा करते हैं तो अमेरिका के राष्ट्रपति कम, वहां के कारपोरेट जगत के संरक्षक ज्यादा दिखते हैैं और यही आभास कराते हैैं कि उन्हें दुनिया की समस्याओं की कहीं कोई परवाह नहीं।

भारत पर अमेरिका का दबाव
ट्रंप विभिन्न देशों पर दबाव डालने का कोई मौका नहीं छोड़ते। शायद यही कारण रहा कि उन्होंने मोदी से मुलाकात के पहले इस आशय का ट्वीट किया कि भारत को अमेरिकी उत्पादों पर आयात शुल्क कम करना होगा। उनके ऐसे ट्वीट यही बताते हैैं कि वह अंतरराष्ट्रीय मामलों में अपनी ही चलाना चाहते हैैं। उनके इस रवैये के चलते ही अमेरिका के चीन से भी रिश्ते बिगड़े और रूस से भी। ओसाका में ट्रंप और मोदी की मुलाकात के पहले अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पोंपियो ने नई दिल्ली की यात्रा की थी। इस दौरान भारत ने यह साफ कर दिया था कि वह अमेरिका से रिश्ते मजबूत करते हुए अन्य देशों के साथ अपने ऐतिहासिक रिश्तों की अनदेखी नहीं कर सकता और वह अपने राष्ट्रीय हितों को देखते हुए ही फैसले लेगा।

अमेरिका से रिश्ते मजबूत
अमेरिका इसकी अनदेखी नहीं कर सकता कि भारत को पाकिस्तान और चीन के खतरे से निपटने के साथ ही निर्धनता और अशिक्षा जैसी समस्याओं से भी लड़ना है। इसमें उसे अमेरिका की मदद चाहिए। इसी कारण भारत यह चाहता है कि अमेरिका से रिश्ते मजबूत हों। ये मजबूत होने भी चाहिए, क्योंकि दोनों दुनिया के सबसे बड़े और शक्तिशाली लोकतंत्र हैैं। ऐसे लोकतांत्रिक देशों को एक-दूसरे का स्वाभाविक मित्र होना चाहिए। अमेरिका इसकी अनदेखी नहीं कर सकता कि भारत ने उसके उत्पादों पर आयात शुल्क बढ़ाने का फैसला तब किया जब उसने भारत को तरजीही राष्ट्र वाली जीएसपी व्यवस्था से बाहर करने का फैसला किया।

भारत सरकार को सतर्क रहने की जरूरत
चूंकि अमेरिका इन दिनों चीन के साथ अपने व्यापार असंतुलन को खत्म करने के लिए प्रतिबद्ध है इसलिए वह उसके प्रति तीखे तेवर अपनाए हुए है। इसके चलते तमाम अमेरिकी कंपनियां चीन से निकलना चाहती हैैं और भारत में अपने लिए संभावनाएं तलाश कर रही हैैं। अमेरिका इसे भारत के लिए एक बड़ा अवसर मान रहा है, लेकिन भारत सरकार को सतर्क रहने की जरूरत है।

अमेरिकी कंपनियां भारत में तकनीक उपलब्ध कराएं
भारत को अपने बाजार को अमेरिकी कंपनियों के लिए खोलते समय यह ध्यान रखना होगा कि ऐसी अमेरिकी कंपनियां ही भारत आएं जो मेक इन इंडिया में सहायक बनें और साथ ही रोजगार के नए अवसर पैदा करने में भी। यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि अमेरिकी कंपनियां भारत में ही अपने माल का उत्पादन करें और ऐसा करते समय तकनीक भी उपलब्ध कराएं। इसके साथ ही भारत को वह उच्च तकनीक भी चाहिए जो देश के तेज चहुंमुखी विकास में सहायक बन सके। फिलहाल इसमें भारत को बड़ी सफलता नहीं मिली है।

रक्षा सामग्री के उत्पादन में आत्मनिर्भर
अमेरिकी कंपनियां तरह-तरह के आश्वासन तो देने में लगी हुई हैैं, लेकिन वे वांछित तकनीक देने के लिए आगे नहीं आ रही हैैं। वे वही तकनीक भारत को देने को तत्पर हैैं जिसमें उन्हें अपना फायदा दिख रहा है। नि:संदेह आज आतंकवाद एक बड़ा खतरा है और भारत को चीन एवं पाकिस्तान से भी सतर्क रहने की जरूरत है, लेकिन इन खतरों से निपटने की तैयारी करते हुए भारत को अमेरिका से केवल रक्षा-सुरक्षा संबंधी बड़े सौदे करने तक ही सीमित नहीं रहना चाहिए। भारत को अपनी रक्षा जरूरतों को पूरी करते हुए यह भी देखना होगा कि देश रक्षा सामग्री के उत्पादन के मामले में आत्मनिर्भर कैसे बने? यह तभी संभव होगा जब विश्व की अग्रिम हथियार निर्माता कंपनियां भारत आकर अपनी तकनीक भी हस्तांतरित करें। भारत को इसके प्रति भी सतर्क रहना होगा कि वह अपनी रक्षा जरूरतों को पूरा करने के फेर में वैसी सामग्री खरीदने से बचे जो उसके बहुत अनुकूल न हों।

विदेशी कंपनियां अपना हित पहले देखती हैैं
भारत को अमेरिका से न केवल अपनी जरूरत के हिसाब से रक्षा तकनीक चाहिए, बल्कि वह तकनीक भी चाहिए जो देश के स्वास्थ्य, शिक्षा के ढांचे को मजबूत कर सके। इसी के साथ भारत को पर्यावरण अनुकूल ऐसी तकनीक भी चाहिए जो प्रदूषण संबंधी समस्याओं से निपटने में मददगार हो। चूंकि विदेशी कंपनियां अपना हित पहले देखती हैैं इसीलिए वे भारत के विभिन्न नियम-कानूनों में तो ढील चाहती हैैं, लेकिन भारत की सभी जरूरतों की पूर्ति करने के लिए तैयार नहीं दिख रही हैैं। भारत की एक बड़ी प्राथमिकता गरीबी से लड़ने के साथ अपने आधारभूत ढांचे का तेजी से विकास करना है।

भारत को विदेशी निवेश की आवश्यकता है
गरीबी दूर करने के साथ अपनी सामाजिक समस्याओं के समाधान के लिए भारत को अच्छे-खासे विदेशी निवेश की आवश्यकता है, लेकिन मुश्किल यह है कि अमेरिकी कंपनियां ऐसे क्षेत्रों में निवेश के लिए उत्साहित नहीं दिख रही हैं। शायद इसका एक कारण यह है कि ऐसे क्षेत्रों में निवेश बहुत लाभकारी नहीं होता। भारत को इस मुश्किल को आसान बनाने पर ध्यान देना होगा। अमेरिका को भी यह चाहिए कि वह भारतीय हितों की चिंता करते हुए ही अपने हितों की पूर्ति की अपेक्षा करे। वास्तव में ऐसा होने पर ही दोनों देशों के रिश्तों में मजबूती आएगी।

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